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भारत में ऋण के औपचारिक स्रोत बढ़ाने की जरूरत
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ऋण के दो मुख्य स्रोत हैं –
- औपचारिक: बैंक और सहकारी समितियाँ।
- अनौपचारिक: साहूकार, व्यापारी, मित्र और रिश्तेदार।
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औपचारिक ऋण सस्ता होता है (8–10% ब्याज), अनौपचारिक ऋण बहुत महंगा होता है।
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शोषण की संभावना – औपचारिक ऋण सुरक्षित है, लेकिन अनौपचारिक ऋण लेने वाले अक्सर शोषित होते हैं।
इसलिए भारत में लोगों को सस्ता और सुरक्षित ऋण देने के लिए औपचारिक स्रोत बढ़ाने जरूरी हैं।
असंगठित क्षेत्रक में श्रमिकों का शोषण किया जाता है।" क्या आप इस विचार से सहमत हैं ? अपने उत्तर के समर्थन में कारण दें।
हां असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का शोषण होता है।
कारण:
- आर्थिक शोषण – उन्हें काम के बदले उचित मजदूरी नहीं मिलती। वे अक्सर लंबे समय तक काम करते हैं लेकिन सुरक्षित रोजगार या लाभ नहीं पाते।
- सामाजिक अन्याय – कई बार उन्हें समाज में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। जैसे विशेष स्थानों पर जाने या सेवाओं का उपयोग करने से वंचित रहना।
- कम सुरक्षा एवं सुविधा – असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों के पास बीमा, पेंशन, छुट्टियाँ आदि जैसी सुविधाएँ नहीं होती।
असंगठित क्षेत्र के श्रमिक आर्थिक और सामाजिक दोनों रूपों में शोषण का शिकार हैं। उन्हें सुरक्षित और समान अधिकार देकर ही उनके व्यक्तित्व और देश की सेवा में योगदान सुनिश्चित किया जा सकता है।
सांप्रदायिकता क्या है ? भारत में सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाले विभिन्न कारकों का उल्लेख करें।
सांप्रदायिकता का अर्थ है अपने धर्म को सबसे श्रेष्ठ मानना और अन्य धर्मों के प्रति नकारात्मक या घृणा की भावना रखना।
भारत में सांप्रदायिकता बढ़ाने वाले कारक:
- धार्मिक विवाद – मंदिर, मस्जिद आदि को लेकर विवाद और राजनीतिक दलों द्वारा उनका बढ़ावा।
- राजनीतिक कारण – चुनाव में धर्म के आधार पर वोट लेने के लिए कुछ संप्रदाय को विशेष महत्व देना।
- कट्टरपंथी – समाज में धार्मिक उन्माद फैलाना और लोगों को धर्म के नाम पर बांटना।
उद्योगों द्वारा पर्यावरण निम्नीकरण को कम करने के लिए उठाए गए विभिन्न उपायों की चर्चा करें।
उद्योगों द्वारा पर्यावरण प्रदूषण कम करने के उपाय
- साफ़ बिजली का प्रयोग – कोयला या तेल की जगह जल विद्युत का उपयोग करें, इससे धुआँ कम होगा।
- उत्तम कोयले का उपयोग – अगर तापीय बिजली बनानी हो तो अच्छा कोयला प्रयोग करें, इससे प्रदूषण कम होगा।
- कारखानों का स्थान – धुआँ और जहरीली गैसें फैलाने वाले कारखानों को शहरों से दूर लगाना चाहिए।
- जल का उपचार – फैक्ट्रियों का गंदा पानी नदियों में छोड़ने से पहले साफ़ किया जाना चाहिए।
भारत में सौर ऊर्जा का भविष्य उज्ज्वल क्यों है?
- प्रचुर सूर्य का प्रकाश – भारत एक गर्म देश है, यहाँ सौर ऊर्जा का उत्पादन अधिक संभव है।
- फोटोवोल्टाइक तकनीक – सूर्य की रोशनी को सीधे बिजली में बदला जा सकता है।
- सस्ता और मुफ्त स्रोत – सूर्य का प्रकाश मुफ्त है, गरीब लोग भी इसका लाभ ले सकते हैं।
- नवीकरणीय ऊर्जा – सौर ऊर्जा बार-बार प्रयोग की जा सकती है, जबकि कोयला और गैस सीमित हैं।
- विविध उपयोग – सौर ऊर्जा का उपयोग खाना बनाने, पानी गर्म करने, जल पंप, दूध की पाश्चराइजेशन और सड़क रोशनी में किया जा सकता है।
वीटो का क्या तात्पर्य है ? युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को ब्रेटन वुड्स व्यवस्था भी कहा जाता है, क्यों ?
वीटो का अर्थ
- वीटो का मतलब है निषेधाधिकार।
- इसके द्वारा कोई एक शक्तिशाली देश किसी प्रस्ताव को अस्वीकार कर सकता है।
ब्रेटन वुड्स समझौता / व्यवस्था
- 1944 में अमेरिका के ब्रेटन वुड्स नामक स्थान पर एक समझौता हुआ।
- इसका उद्देश्य द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व अर्थव्यवस्था को स्थिर करना था।
मुख्य कारण:
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अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की स्थापना हुई, ताकि देशों को व्यापार घाटे से निपटने में मदद मिले।
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विश्व बैंक की स्थापना हुई, ताकि युद्ध से नष्ट देशों के पुनर्निर्माण में सहायता मिल सके।
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इसी कारण युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को ब्रेटन वुड्स व्यवस्था कहा जाता है।
बहुउद्देशीय परियोजनाओं के लाभ
- सिंचाई में सुधार – नहरों से पहले ऊसर जमीन अब सिंचित होती है और खेती से अधिक अनाज उगता है।
- बाढ़ नियंत्रण – बड़े बाँध बाढ़ के पानी को रोकते हैं और लोगों की जान-माल की सुरक्षा करते हैं।
- भूख और अकाल से बचाव – इन बाँधों के कारण लोगों को अनाज और पानी मिलता है, भूख से मरने वालों की संख्या कम हुई।
- विद्युत उत्पादन – बिजली पैदा होती है, जिससे कारखाने चलते हैं और जीवन सुविधाजनक बनता है।
- मछली पालन – बाँधों के जलाशयों में मछली पालन की सुविधा हुई।
- व्यापार और उद्योग में वृद्धि – अधिक अनाज और बिजली मिलने से कारखाने और व्यापार बढ़े।
- आधुनिक भारत का निर्माण – पंडित नेहरू ने इन्हें 'आधुनिक भारत के मंदिर' कहा।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर महामंदी के प्रभाव (संक्षेप में):
- व्यापार में गिरावट: 1929–34 के बीच भारत के आयात-निर्यात में लगभग 50% की कमी हुई।
- किसानों पर असर: खासकर बंगाल के पटसन किसानों को भारी नुकसान हुआ; पटसन के दाम लगभग 60% गिर गए और किसान कर्ज़ में डूब गए।
- छोटे किसान परेशान: उनकी हालत खराब हुई, लेकिन सरकार ने करों में कोई राहत नहीं दी।
- आंदोलन को बढ़ावा: ग्रामीण असंतोष बढ़ा और 1930 का सविनय अवज्ञा आंदोलन तेज हुआ।
कार्न लॉ के समाप्त करने के बारे में ब्रिटिश सरकार के फैसले के प्रभावों की व्याख्या करते हुए संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
कार्न लॉ (संक्षिप्त टिप्पणी)
- कार्न लॉ वे कानून थे जो 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश सरकार ने अपने भू-स्वामियों के हित में बनाए थे।
- इन कानूनों के तहत विदेशों से खाद्य पदार्थों के आयात पर रोक लगा दी गई थी।
- इससे ब्रिटेन में अनाज और भोजन के दाम बहुत बढ़ गए।
- जनता में असंतोष बढ़ा, इसलिए सरकार को ये कानून समाप्त करने पड़े।
कार्न लॉ समाप्त होने के प्रभाव
- विदेशों से सस्ता अनाज आने लगा, जिससे गरीब और आम लोगों को लाभ हुआ।
- ब्रिटेन के भू-स्वामियों और किसानों को नुकसान हुआ।
- बहुत-सी जमीन बेकार हो गई और किसान बेरोजगार हो गए।
- बेरोजगार ग्रामीण लोग काम की तलाश में शहरों की ओर जाने लगे।
जी-77 क्या है?
- इसका गठन इसलिए हुआ क्योंकि ब्रेटन वुड्स सम्मेलन (1944) के नियमों से इन देशों को लाभ नहीं मिला।
जी-77 को ब्रेटन वुड्स की जुड़वा संतानों की प्रतिक्रिया क्यों कहा जाता है?
- ब्रेटन वुड्स सम्मेलन से अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक बने।
- इन्हें ब्रेटन वुड्स की जुड़वा संतान कहा जाता है।
- इन संस्थाओं पर विकसित देशों का अधिक नियंत्रण था।
- विकासशील देशों को इनसे अपेक्षित लाभ नहीं मिला।
- इसी असंतोष की प्रतिक्रिया में जी-77 का गठन हुआ।
जी-77 की प्रमुख माँगें (नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के लिए):
- (क) अपने प्राकृतिक संसाधनों पर पूरा नियंत्रण मिले।
- (ख) विकास के लिए अधिक आर्थिक सहायता मिले।
- (ग) कच्चे माल के उचित दाम मिलें।
- (घ) अपने तैयार माल को विकसित देशों के बाजारों में बेचने का बेहतर अवसर मिले।
👉 निष्कर्ष:
इस प्रकार जी-77, IMF और विश्व बैंक जैसी ब्रेटन वुड्स संस्थाओं से असंतुष्ट विकासशील देशों की सामूहिक प्रतिक्रिया है।
ठीक है 🙂
नीचे खिलाफत आन्दोलन पर पॉइंट-वाइज, सरल और संक्षिप्त उत्तर दिया गया है — सीधे परीक्षा में लिखने योग्य।
खिलाफत आन्दोलन (संक्षिप्त टिप्पणी)
- प्रथम विश्व युद्ध के बाद ऑटोमन तुर्की की हार हो गई।
- इससे इस्लाम के धार्मिक नेता खलीफा के पद को खतरा पैदा हो गया।
- भारतीय मुसलमानों में असंतोष फैल गया।
- खलीफा के सम्मान की रक्षा के लिए मार्च 1919 में बम्बई में खिलाफत समिति बनाई गई।
- इस आन्दोलन का नेतृत्व मोहम्मद अली और शौकत अली ने किया।
- उन्होंने महात्मा गाँधी से सहयोग माँगा।
- गाँधीजी ने इस आन्दोलन का समर्थन किया।
- सितम्बर 1920 में खिलाफत आन्दोलन को असहयोग आन्दोलन से जोड़ दिया गया।
ठीक है 🙂
नीचे उत्तर थोड़ा संक्षेप, बहुत साधारण और परीक्षा-उपयोगी भाषा में दिया गया है — पॉइंट-वाइज।
नेपोलियन की संहिता की प्रमुख विशेषताएँ
(संक्षेप में)
- जन्म के आधार पर मिलने वाले विशेषाधिकार समाप्त किए गए।
- कानून के सामने सभी को समान माना गया।
- संपत्ति के अधिकार को सुरक्षित किया गया।
- सामंती प्रथा समाप्त की गई और किसानों को कर व बेगार से मुक्ति मिली।
- प्रशासनिक व्यवस्था को सरल बनाया गया।
- कारीगरों के पुराने संघों के नियंत्रण खत्म किए गए।
- यातायात और संचार व्यवस्था में सुधार किया गया।
- समान माप-तौल और नई मुद्रा लागू की गई।
यह उत्तर 3–4 अंक के प्रश्न के लिए बिल्कुल उपयुक्त है।
चाहें तो मैं इसे और छोटा (5 लाइन) भी बना सकता हूँ।
रॉलेट एक्ट क्या था और इसका विरोध क्यों हुआ ?
(संक्षेप उत्तर)
- 1919 में ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट लागू किया।
- इस कानून के तहत बिना मुकदमा चलाए किसी को भी जेल भेजा जा सकता था।
- इससे भारतीयों के अधिकार छिन गए, इसलिए लोग इसका विरोध करने लगे।
- गाँधीजी ने इसे अन्यायपूर्ण कानून बताया।
- उन्होंने अहिंसक तरीके से नागरिक अवज्ञा आंदोलन शुरू किया।
- 6 अप्रैल 1919 को देशभर में हड़ताल हुई।
- कई जगह सभाएँ, जुलूस हुए और दुकानें बंद रहीं।
- अंग्रेजों ने दमन किया और नेताओं को गिरफ्तार किया।
ठीक है 🙂
नीचे उसी उत्तर को और भी सरल, साफ़ और परीक्षा-उपयोगी भाषा में लिखा गया है। भाषा आसान रखी गई है ताकि लघु और दीर्घ दोनों उत्तर में आराम से लिखा जा सके।
1. इटली के एकीकरण की प्रक्रिया
अथवा
इटली के एकीकरण में विक्टर इमेनुएल द्वितीय, कावूर और ज्युसेपे गैरीबॉल्डी की भूमिका
उत्तर—
19वीं शताब्दी के मध्य में इटली एक स्वतंत्र देश नहीं था। यह कई छोटे-छोटे राज्यों में बँटा हुआ था। इटली के कुछ भागों पर विदेशी शक्तियों, विशेषकर ऑस्ट्रिया का शासन था। इटली के एकीकरण में विक्टर इमेनुएल द्वितीय, कावूर और ज्युसेपे गैरीबॉल्डी की मुख्य भूमिका रही।
(1) इटली की स्थिति
- इटली अनेक छोटे वंशानुगत राज्यों में विभाजित था।
- उत्तर इटली का बड़ा भाग ऑस्ट्रिया के हैब्सबर्ग साम्राज्य के अधीन था।
- इटली की जनता एक राष्ट्र के रूप में एक होना चाहती थी।
(2) विक्टर इमेनुएल द्वितीय की भूमिका
- विक्टर इमेनुएल द्वितीय सार्डिनिया-पीडमॉण्ट का शासक था।
- उसके नेतृत्व में इटली को युद्ध के माध्यम से एक करने का प्रयास किया गया।
- बाद में वही एकीकृत इटली का पहला राजा बना।
(3) कावूर की भूमिका
- कावूर सार्डिनिया-पीडमॉण्ट का प्रधानमंत्री था।
- उसने इटली के एकीकरण आंदोलन का नेतृत्व किया।
- कावूर ने फ्रांस से कूटनीतिक समझौता किया।
- फ्रांस की सहायता से 1859 में ऑस्ट्रिया को युद्ध में पराजित किया गया।
(4) ज्युसेपे गैरीबॉल्डी की भूमिका
- गैरीबॉल्डी एक प्रसिद्ध क्रांतिकारी नेता था।
- उसके नेतृत्व में बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों की सेना बनी।
- 1860 में उसने दक्षिण इटली और दो सिसिलियों पर अधिकार कर लिया।
- उसने विदेशी शासकों को हटाकर जनता और किसानों का समर्थन प्राप्त किया।
(5) एकीकरण की सफलता
- इन तीनों नेताओं के प्रयासों से इटली के अलग-अलग राज्य एक हो गए।
- 1861 में विक्टर इमेनुएल द्वितीय को एकीकृत इटली का राजा घोषित किया गया।
निष्कर्ष
इस प्रकार,
विक्टर इमेनुएल द्वितीय के नेतृत्व,
कावूर की कूटनीति और
ज्युसेपे गैरीबॉल्डी के सैन्य संघर्ष के कारण इटली का एकीकरण सफल हो सका।
अगर चाहें तो मैं इसे
✔️ 5 अंक / 8 अंक का बोर्ड-उत्तर,
✔️ और भी छोटा संस्करण,
✔️ या याद रखने के लिए पॉइंट-ट्रिक में भी बना सकता हूँ।
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